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श्लोक 2.5.110  |
तत्रापि वल्लवाधीश-नन्दनालम्बना रतिः ।
सान्द्रानन्द-चमत्कार-परमावधिर् इष्यते ॥२.५.११०॥ |
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| अनुवाद |
| "वह रति जो नन्द के पुत्र को लक्ष्य बनाती है, परम आनन्द की पराकाष्ठा को प्राप्त होती है।" |
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| "That Rati who aims at Nanda's son, attains the pinnacle of supreme bliss." |
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