vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री भक्ति रसामृत सिंधु
»
सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस
»
लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)
»
श्लोक 110
श्लोक
2.5.110
तत्रापि वल्लवाधीश-नन्दनालम्बना रतिः ।
सान्द्रानन्द-चमत्कार-परमावधिर् इष्यते ॥२.५.११०॥
अनुवाद
"वह रति जो नन्द के पुत्र को लक्ष्य बनाती है, परम आनन्द की पराकाष्ठा को प्राप्त होती है।"
"That Rati who aims at Nanda's son, attains the pinnacle of supreme bliss."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×