श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  2.5.110 
तत्रापि वल्लवाधीश-नन्दनालम्बना रतिः ।
सान्द्रानन्द-चमत्कार-परमावधिर् इष्यते ॥२.५.११०॥
 
 
अनुवाद
"वह रति जो नन्द के पुत्र को लक्ष्य बनाती है, परम आनन्द की पराकाष्ठा को प्राप्त होती है।"
 
"That Rati who aims at Nanda's son, attains the pinnacle of supreme bliss."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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