श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 109
 
 
श्लोक  2.5.109 
वियोगे त्व् अद्भुतानन्द-विवर्तत्वं दधत्य् अपि ।
तनोत्य् एषा प्रगाढार्ति-भराभासत्वम् ऊर्जिता ॥२.५.१०९॥
 
 
अनुवाद
"यह रति अद्भुत आनंद में वियोग में अपने पूर्ण रस रूप को विकसित करती है, और चूंकि यह इस रूप को बिल्कुल नहीं छोड़ती, इसलिए कोई भी दुख केवल आभास मात्र है।"
 
"This love develops its full form of rasa in separation in wonderful bliss, and since it never abandons this form at all, any suffering is only an appearance."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)