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श्लोक 2.5.105  |
पराश्रयतयाप्य् एते जातु भान्तः सुखादयः ।
हृदये परमानन्द-सन्दोहम् उपचिन्वते ॥२.५.१०५॥ |
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| अनुवाद |
| "ऐसा इसलिए है क्योंकि जब भक्त दूसरों के सुख को देखता है, तो उसके हृदय में अतुलनीय आनंद उत्पन्न होता है।" |
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| “This is because when a devotee sees the happiness of others, incomparable joy arises in his heart.” |
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