श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.5.102 
एषां स्व-पर-सम्बन्ध-नियमानिर्णयो हि यः ।
साधारण्यं तद् एवोक्तं भावानां पूर्व-सूरिभिः ॥२.५.१०२॥
 
 
अनुवाद
“प्राचीन ऋषियों ने वर्तमान और भूतपूर्व भक्तों के बीच भावों की अप्रतिबंधित पहचान का वर्णन किया है।”
 
“The ancient sages have described the unrestricted identity of feelings between present and past devotees.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)