श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 5: स्थायी-भाव (स्थायी आनंदवर्धक भाव)  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.5.100 
किन्त्व् एतस्याः प्रभावो’पि वैरूप्ये सति कुञ्चति ।
वैरूप्यस् तु विभावादेर् अनौचित्यम् उदीर्यते ॥२.५.१००॥
 
 
अनुवाद
"यदि विभाव या अन्य तत्वों में कोई विकृति है, तो रति की शक्ति कम हो जाती है। विकृति का अर्थ है कि विभाव या अन्य तत्वों में अनुपयुक्त तत्व हैं।"
 
"If there is any distortion in the vibhava or other elements, the power of Rati is reduced. Vikruti means that there are unsuitable elements in the vibhava or other elements."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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