श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 91
 
 
श्लोक  2.4.91 
यथा —
तव चिर-विरहेण प्राप्य पीडाम् इदानीं
दधद्-उरु-जडिमानि ध्मापितान्य् अङ्गकानि ।
श्वसित-पवन-धाटी-घट्टित-घ्राण-वाटं
लुठति धरणि-पृष्ठे गोष्ठ-वाटी-कुटुम्बम् ॥२.४.९१॥
 
 
अनुवाद
"हे कृष्ण! दीर्घकाल से आपसे वियोग में आपके व्रजवासी पार्षद दुःखी हैं। उनके शरीर जल रहे हैं और निश्चल हैं। भारी श्वास के कारण उनके नथुने फड़क रहे हैं और वे भूमि पर लोट रहे हैं।"
 
"O Krishna! Your Vrajavasi associates are grieved at being separated from you for so long. Their bodies are burning and motionless. Their nostrils are flaring due to heavy breathing, and they are rolling on the ground."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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