श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.4.81 
तत्र प्रौढानन्दाद्, यथा कर्णामृते (२.२५) —
राधा पुनातु जगद् अच्युत-दत्त-चित्ता
मन्थानकं विदधती दधि-रिक्त-पात्रे ।
यस्याः स्तन-स्तवक-चञ्चल-लोचनालिर्
देवो’पि रुद्ध-हृदयो धवलं दुदोह ॥२.४.८१॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण-कर्णामृत से, तीव्र आनंद से उत्पन्न उन्माद: "राधा, जिन्होंने अपना हृदय कृष्ण को समर्पित कर, खाली दही के बर्तन को मथ डाला, वे संसार को पवित्र करें। और कृष्ण, जिनकी मधुमक्खियाँ जैसी आँखें राधा के पुष्पगुच्छों जैसे स्तनों पर मँडराती थीं, और जो राधा में मन लगाकर बैल का दूध दुहने लगे, वे संसार को पवित्र करें।"
 
From Krishna-Karnāmṛta, the frenzy of intense bliss: "May Radha, who, surrendering her heart to Krishna, churned the empty curd pot, purify the world. And may Krishna, whose bee-like eyes hovered over Radha's flower-bunched breasts, and who, absorbed in Radha, milked the bull, purify the world."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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