श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 75
 
 
श्लोक  2.4.75 
यथा वा —
चण्डांशोस् तुरगान् सटाग्र-नटनैर् आहत्य विद्रावयन्
द्राग् अन्धङ्करणः सुरेन्द्र-सुदृशां गोष्ठोद्धूतैः पांशुभिः ।
प्रत्यासीदतु मत्-पुरः सुर-रिपुर् गर्वान्धम् अर्वाकृतिर्
द्रगिष्ठे मुहुर् अत्र जाग्रति भुजे व्यग्रासि मातः कथम् ॥२.४.७५॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण : "हे माता! अश्वरूपी राक्षस केशी अपने खुरों से अस्तबल की धूल उड़ाकर इंद्र की देवकन्याओं को अन्धा कर देता है। अपनी अयाल हिलाकर वह सूर्य के रथ को खींचने वाले घोड़ों को कोड़े मारकर भगा देता है। किन्तु उस राक्षस घोड़े को मेरी ओर आने दो! मेरी लम्बी भुजा उसके लिए तैयार है! तुम इतनी व्याकुल क्यों हो?"
 
Another example: "O Mother! The horse-like demon Keshi blinds Indra's celestial maidens by raising dust from the stable with his hooves. By shaking his mane, he whips and drives away the horses pulling the chariot of the Sun. But let that demon horse come towards me! My long arm is ready for him! Why are you so distraught?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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