श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  2.4.71 
यथा वा —
समम् उरु-करकाभिर् दन्ति-शुण्डा-सपिण्डाः
प्रतिदिशम् इह गोष्ठे वृष्टि-धाराः पतन्ति ।
अजनिषत युवानो’प्य् आकुलास् त्वं तु बालः
स्फुटम् असि तद्-अगारान् मा स्म भूर् निर्यियासुः ॥२.४.७१॥
 
 
अनुवाद
एक और उदाहरण: "वर्षा और ओले हाथियों के माथे से रस की तरह बरस रहे हैं। युवक भ्रमित हो गए हैं। तुम अभी बालक हो; इसलिए घर से बाहर जाने की कोशिश मत करो।"
 
Another example: "Rain and hail are pouring down like juice from the foreheads of elephants. The young men are confused. You are still children; so don't try to go out of the house."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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