श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  2.4.57 
उग्र-निस्वनेन, यथा —
आकर्ण्य कर्ण-पदवी-विपदं यशोदा
विस्फूर्जितं दिशि दिशि प्रकटं वृकाणाम् ।
यामान् निकाम-चतुरा चतुरः स्व-पुत्रं
सा नेत्र-चत्वर-चरं चिरम् आचचार ॥२.४.५७॥
 
 
अनुवाद
भयावह ध्वनियों से उत्पन्न भय: "जब अत्यंत बुद्धिमान यशोदा ने चारों ओर से गूंजती भेड़ियों की भयानक चीख सुनी, जिससे कानों को पीड़ा हो रही थी, तो उन्होंने कुछ दिनों तक कृष्ण को निरंतर अपनी दृष्टि में रखा।"
 
Fear caused by frightening sounds: "When the very intelligent Yashoda heard the terrifying howls of wolves echoing all around, causing pain to the ears, she kept Krishna constantly in her sight for a few days."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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