श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  2.4.54 
अथ (९) त्रासः —
त्रासः क्षोभो हृदि तडिद्-घोर-सत्त्वोग्र-निस्वनैः ।
पार्श्वस्थालम्ब-रोमाञ्च-कम्प-स्तम्भ-भ्रमादि-कृत् ॥२.४.५४॥
 
 
अनुवाद
"बिजली, भयानक जीवों या किसी तेज़ आवाज़ से हृदय में उत्पन्न होने वाली व्याकुलता को त्रास (भय) कहते हैं। इस अवस्था में व्यक्ति आस-पास की वस्तुओं को सहारा लेने लगता है, उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं, वह काँप उठता है, स्तब्ध हो जाता है और इधर-उधर भटकता रहता है।"
 
"Fear is the anxiety caused by lightning, frightening creatures, or loud noises. In this state, a person grasps at nearby objects, his hair stands on end, he trembles, becomes stunned, and wanders aimlessly."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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