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श्लोक 2.4.267  |
द्रवेद् अत्राद्य-युगलम् आतपेन यथायथम् ।
द्रवीभूतं स्वभावेन सर्वदैवामृतं भवेत् ।
गोविन्द-प्रेष्ठ-वर्याणां चित्तं स्याद् अमृतं किल ॥२.४.२६७॥ |
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| अनुवाद |
| "मोम और मक्खन सूर्य की अलग-अलग मात्रा में गर्मी से द्रवित हो जाते हैं। अमृत स्वाभाविक रूप से तरल होता है। गोविंद के परम भक्तों का हृदय स्वाभाविक रूप से अमृत के समान कोमल होता है।" |
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| "Wax and butter liquefy with varying degrees of sun heat. Amrita is naturally liquid. The hearts of Govinda's supreme devotees are naturally soft like Amrita." |
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