श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 254
 
 
श्लोक  2.4.254 
एतेन सहजेनैव भावेनानुगता रतिः ।
एक-रूपापि या भक्तेर् विविधा प्रतिभात्य् असौ ॥२.४.२५४॥
 
 
अनुवाद
"इस स्वाभाविक भाव से रति (आकर्षण या प्रेम) प्रकट होती है। यद्यपि सामान्यतः रति एक ही होती है, फिर भी जब इसके विभिन्न गुणों का वर्णन करना हो तो यह विभिन्न रूपों में प्रकट होती है।"
 
"From this natural feeling arises Rati (attraction or love). Although Rati is generally one, yet when its different qualities are to be described, it manifests in different forms."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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