श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 245
 
 
श्लोक  2.4.245 
यथा —
शक्तः किं नाम कर्तुं स शिशुर् अहह मे मित्र-पक्षानधाक्षीद्
आतिष्ठेयं तम् एव द्रुतम् अथ शरणं कुर्युर् एतन् न वीराः ।
आं दिव्या मल्ल-गोष्ठी विहरति स करेणोद्दधाराद्रि-वर्यं
कुर्याम् अद्यैव गत्वा व्रज-भुवि कदनं हा ततः कम्पते धीः ॥२.४.२४५॥
अत्र गर्व-विषाद-दैन्य-मति-स्मृति-शङ्कामर्ष-त्रासानां शावल्यम् ।
 
 
अनुवाद
इस उदाहरण में गर्व (अभिमान), विषाद (निराशा), दैन्यम (कमजोर महसूस करना), मति (विचार), स्मृति (स्मरण), शंका (आशंका), अमर्ष (क्रोध) और त्रास (भय) का मिश्रण है: "वह बालक क्या कर सकता है? उसने तो मेरे सभी मित्रों को मार डाला है! तो क्या मुझे उसके सामने आत्मसमर्पण कर देना चाहिए? एक योद्धा ऐसा कभी नहीं कर सकता। मैं उससे लड़ने के लिए बड़े-बड़े पहलवान तैयार कर रहा हूँ; लेकिन उसने तो अपने हाथ से गोवर्धन को उठा लिया है। मुझे आज ही व्रज जाकर उस पर आक्रमण करना चाहिए, लेकिन उसके कारण मेरा हृदय काँप रहा है।"
 
This example is a mixture of pride (garva), vishaada (despair), dainyam (feeling weak), mati (thoughts), smriti (memory), shaka (apprehension), amarsha (anger) and traas (fear): "What can that boy do? He has killed all my friends! So should I surrender to him? A warrior can never do that. I am preparing great wrestlers to fight him; but he has lifted Govardhan with his own hands. I should go to Vraj today and attack him, but my heart is trembling because of him."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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