श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 237
 
 
श्लोक  2.4.237 
यथा —
राक्षसीं निशि निशाम्य निशान्ते
गोकुलेश-गृहिणी पतिताङ्गीम् ।
तत्-कुचोपरि सुतं च हसन्तं
हन्त निश्चल-तनुः क्षणम् आसीत् ॥२.४.२३७॥
अत्रानिष्टेष्ट-संवीक्षाकृतयोर् जाड्ययोर् युतिः ।
 
 
अनुवाद
अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उत्पन्न जड़्य: “‘सायं काल में मृत राक्षसी पृथ्वी पर पड़ी थी और आपका पुत्र उसकी छाती पर बैठकर हंस रहा था।’ जब यशोदा ने यह सुना, तो वह कुछ देर तक निश्चल बैठी रहीं।”
 
Inertia caused by favorable and unfavorable circumstances: “‘In the evening the dead demoness was lying on the ground and your son was sitting on her chest and laughing.’ When Yashoda heard this, she sat motionless for some time.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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