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श्लोक 2.4.229  |
तत्र अप्राणिनि, यथा —
छाया न यस्य सकृद् अप्य् उपसेविताभूत्
कृष्णेन हन्त मम तस्य धिग् अस्तु जन्म ।
मा त्वं कदम्ब विधुरो भव कालियाहिं
मृद्नन् करिष्यति हरिश् चरितार्थतां ते ॥२.४.२२९॥
अत्र निर्वेदस्य । |
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| अनुवाद |
| वृक्षों में आत्म-हीनता: "मेरा जीवन व्यर्थ है क्योंकि कृष्ण ने एक बार भी मेरी शाखाओं की छाया का आनंद नहीं लिया।" "हे कदम्ब वृक्ष, शोक मत करो! जब कृष्ण तुम्हारी शाखाओं से कूदकर कालिया को दंड देंगे, तब तुम्हें जीवन में सफलता मिलेगी!" |
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| Self-deprecation in trees: "My life is meaningless because Krishna did not enjoy the shade of my branches even once." "O Kadamba tree, do not grieve! When Krishna jumps from your branches and punishes Kaliya, then will you find success in life!" |
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