श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 227
 
 
श्लोक  2.4.227 
यथा वा —
डुण्डभो जलचरः स कालियो
गोष्ठ-भूभृद् अपि लोष्ट्र-सोदरः ।
तत्र कर्म किम् इवाद्भुतं जने
येन मूर्ख जगदीशतेर्यते ॥२.४.२२७॥
अत्रासूयायाः ।
 
 
अनुवाद
ईर्ष्या से संबंधित भाव की प्रतिकूल अभिव्यक्ति का एक और उदाहरण: "हे मूर्ख अक्रूर! यह कालिय तो एक हानिरहित जल सर्प है। गोवर्धन पर्वत तो केवल मिट्टी का एक ढेला है। तुम एक ऐसे व्यक्ति को ब्रह्माण्ड-नियन्ता की उपाधि दे रहे हो जिसने अभी-अभी एक हानिरहित सर्प को वश में किया है और मिट्टी का एक ढेर उठा लिया है!"
 
Another example of the adverse expression of the emotion related to jealousy: "O fool Akrura! This Kaliya is a harmless water serpent. Mount Govardhana is just a lump of mud. You are giving the title of controller of the universe to a person who has just tamed a harmless serpent and lifted a lump of mud!"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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