श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 208
 
 
श्लोक  2.4.208 
तत्र साक्षात् —
मुख्याम् एव रतिं पुष्णन् साक्षाद् इत्य् अभिधीयते ॥२.४.२०८॥
 
 
अनुवाद
“एक श्रेष्ठ व्यवहार-भाव जो प्राथमिक रति का पोषण करता है, उसे प्रत्यक्ष श्रेष्ठ आश्रित व्यवहार-भाव कहा जाता है।”
 
“A superior attitude that nourishes primary passion is called a direct superior dependent attitude.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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