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श्री भक्ति रसामृत सिंधु
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लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)
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श्लोक 207
श्लोक
2.4.207
तत्र वरः —
साक्षाद् व्यवहितश् चेति वरो’प्य् एष द्विधोदितः ॥२.४.२०७॥
अनुवाद
“श्रेष्ठ आश्रित व्यवहार-भाव या तो प्रत्यक्ष होते हैं या अप्रत्यक्ष।”
“The best dependent behaviors are either direct or indirect.”
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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