श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 206
 
 
श्लोक  2.4.206 
तत्र परतन्त्राः —
वरावरतया प्रोक्ताः परतन्त्रा अपि द्विधा ॥२.४.२०६॥
 
 
अनुवाद
“आश्रित व्यवहार-भाव या तो श्रेष्ठ होते हैं या हीन।”
 
“Dependent behavior is either superior or inferior.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)