श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 204
 
 
श्लोक  2.4.204 
वितर्क-मति-निर्वेद-धृतीनां स्मृति-हर्षयोः ।
बोध-भिद्-दैन्य-सुप्तीनां क्वचिद् रति-विभावता ॥२.४.२०४॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार वितर्क (अनुमान), मति (शास्त्रीय निष्कर्ष), निर्वेद (आत्म-घृणा), धृति (हृदय की स्थिरता), स्मृति (स्मरण), हर्ष (आनंद) तथा अज्ञान के नाश से उत्पन्न बोध भी कुछ-कुछ रति के कारण बनते हैं।
 
Similarly, Vitarka (inference), Mati (scriptural conclusion), Nirveda (self-hatred), Dhriti (steadiness of heart), Smriti (recollection), Harsha (joy) and the realization arising from the destruction of ignorance are also partly due to Rati.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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