श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 197
 
 
श्लोक  2.4.197 
निर्वेदे तु यथेर्ष्याया भवेद् अत्र विभावता ।
असूयायां पुनस् तस्या व्यक्तम् उक्तानुभावता ॥२.४.१९७॥
 
 
अनुवाद
"इस प्रकार ईर्ष्य (द्वेष) निर्वेद (आत्म-घृणा) का कारण और असूया (ईर्ष्या) का परिणाम है। यह पहले ही कहा जा चुका है।"
 
"Thus jealousy (aversion) is the cause of nirveda (self-hatred) and the result of asuya (jealousy). This has already been said."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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