श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 196
 
 
श्लोक  2.4.196 
एषां सञ्चारि-भावानां मध्ये कश्चन कस्यचित् ।
विभावश् चानुभावश् च भवेद् एव परस्परम् ॥२.४.१९६॥
 
 
अनुवाद
“व्यवहारिक भावों में कुछ कारण (विभाव) के रूप में कार्य करते हैं और कुछ प्रभाव (अनुभाव) के रूप में।”
 
“Among the practical expressions some act as causes (vibhavas) and some as effects (anubhavas).”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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