श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 190
 
 
श्लोक  2.4.190 
स्वनेन, यथा —
दूराद् विद्रावयन् निद्रा-मरालीर् गोप-सुभ्रुवाम् ।
सारङ्ग-रङ्गदं रेजे वेणु-वारिद-गर्जितम् ॥२.४.१९०॥
 
 
अनुवाद
ध्वनि से: "जिस प्रकार बादलों की गड़गड़ाहट मोरों को प्रसन्न कर हंसों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार बांसुरी की ध्वनि गोपियों की नींद तोड़ देती है।"
 
By sound: "Just as the thunder of clouds delights the peacocks and drives away the swans, similarly the sound of the flute breaks the sleep of the Gopis."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd