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श्लोक 2.4.190  |
स्वनेन, यथा —
दूराद् विद्रावयन् निद्रा-मरालीर् गोप-सुभ्रुवाम् ।
सारङ्ग-रङ्गदं रेजे वेणु-वारिद-गर्जितम् ॥२.४.१९०॥ |
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| अनुवाद |
| ध्वनि से: "जिस प्रकार बादलों की गड़गड़ाहट मोरों को प्रसन्न कर हंसों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार बांसुरी की ध्वनि गोपियों की नींद तोड़ देती है।" |
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| By sound: "Just as the thunder of clouds delights the peacocks and drives away the swans, similarly the sound of the flute breaks the sleep of the Gopis." |
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