श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 178
 
 
श्लोक  2.4.178 
यथा —
कामं तामरसाक्ष केलि-विततिः प्रादुष्कृता शैशवी
दर्पः सर्प-पतेस् तद् अस्य तरसा निर्धूयताम् उद्धूरः ।
इत्य् उत्स्वप्न-गिरा चिराद् यदु-सभां विस्मापयन् स्मेरयन्
निःश्वासेन दरोत्तरङ्गद्-उदरं निद्रां गतो लाङ्गली ॥२.४.१७८॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "बलदेव ने सोते समय यदुओं की सभा को चकित कर दिया और उन्हें हँसाया। भारी साँस लेते और पेट फुलाते हुए, स्वप्नावस्था में उन्होंने कहा, 'हे कमल-नयन कृष्ण! आपने सर्पराज कालिय के असह्य अभिमान को शक्तिशाली रूप से कुचलकर अपनी बाल लीलाओं का वैभव प्रकट किया है।'"
 
Example: "Baladeva, while asleep, astonished the assembly of the Yadus and made them laugh. Breathing heavily and puffing out his belly, he said in his dream state, 'O lotus-eyed Krishna, You have revealed the splendor of Your childhood pastimes by powerfully crushing the unbearable pride of the serpent king Kaliya.'"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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