श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 177
 
 
श्लोक  2.4.177 
अथ (३२) सुप्तिः —
सुप्तिर् निद्रा-विभावा स्यान् नानार्थानुभवात्मिका ।
इन्द्रियोपरति-श्वास-नेत्र-संमीलनादि-कृत् ॥२.४.१७७॥
 
 
अनुवाद
"जिस निद्रा में विविध विचार और विषयों का अनुभव होता है, उसे सुप्ति या स्वप्न कहते हैं। इस अवस्था में बाह्य इंद्रियों की क्रियाएँ अनुपस्थित होती हैं, साँसें तेज़ चलती हैं और आँखें बंद हो जाती हैं।"
 
"The state of sleep in which various thoughts and subjects are experienced is called supti or dream. In this state the functions of the external senses are absent, breathing becomes rapid and the eyes are closed."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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