श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  2.4.168 
अथ (३०) चापल्यम् —
राग-द्वेषादिभिश् चित्त-लाघवं चापलं भवेत् ।
तत्राविचार-पारुष्य-स्वच्छन्दाचरणादयः ॥२.४.१६८॥
 
 
अनुवाद
"चापलम (अशिष्टता) का अर्थ है आकर्षण या विकर्षण से उत्पन्न हृदय की असावधानी। इस अवस्था में, निर्णय की कमी, कठोर वचन और लापरवाह कार्य होते हैं।"
 
"Chapalam (rudeness) means heedlessness of the heart caused by attraction or repulsion. In this state, there is lack of judgment, harsh words and careless actions."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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