श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  2.4.141 
अत्र कर्तव्य-करणं संशय-भ्रमयोश् छिदा ।
उपदेशश् च शिष्याणाम् ऊहापोहादयो’पि च ॥२.४.१४१॥
 
 
अनुवाद
“इस अवस्था में संशय और भ्रम को दूर कर आवश्यक कार्य करना, विद्यार्थियों को निर्देश देना तथा दूसरों के तर्कों को परास्त करना तथा विपरीत निष्कर्ष निकालना होता है।”
 
“In this stage, the necessary work has to be done by removing doubts and confusion, instructing the students and defeating the arguments of others and drawing opposite conclusions.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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