श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  2.4.133 
तत्र विमर्षाद्, यथा विदग्ध-माधवे (२.२७) —
न जानीषे मूर्ध्नश् च्युतम् अपि शिखण्डं यद् अखिलं
न कण्ठे यन् माल्यं कलयसि पुरस्तात् कृतम् अपि ।
तद् उन्नीतं वृन्दावन-कुहर-लीला-कलभ हे
स्फुटं राधा-नेत्र-भ्रमर-वर वीर्योन्नतिर् इयम् ॥२.४.१३३॥
Vइतर्क अरिसिन्ग् fरोम् इन्fएरेन्चे, fरोम् Vइदग्ध-माधव:
 
 
अनुवाद
"हे वृन्दावन के घरों में क्रीड़ा करने वाले हाथी! आपके सिर से मोर पंख ज़मीन पर गिर गया है, किन्तु आपको इसका पता नहीं है। आपके सामने एक तैयार माला पड़ी है, किन्तु आप उसे धारण नहीं करते। इससे मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि राधा के नेत्रों रूपी मधुमक्खियों की शक्ति ने आपको उत्तेजित कर दिया है।"
 
"O elephant who plays in the houses of Vrindavan! A peacock feather has fallen from your head to the ground, but you are unaware of it. A ready-made garland lies before you, but you do not wear it. From this I can infer that the power of Radha's eyes, the bees, has aroused you."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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