श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  2.4.132 
अथ (२१) वितर्कः —
विमर्षात् संशयादेश् च वितर्कस् तूह उच्यते ।
एष भ्रू-क्सेपण-शिरो’ङ्गुलि-सञ्चालनादि-कृत् ॥२.४.१३२॥
 
 
अनुवाद
"त्रुटि, संदेह या अनुमान के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचना वितर्क (अनुमान) कहलाता है। इस अवस्था में भौंहें, सिर और उँगलियाँ हिलाई जाती हैं।"
 
"Reaching a conclusion based on error, doubt, or conjecture is called Vitarka (Inference). In this state, the eyebrows, head, and fingers are moved."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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