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श्लोक 2.4.124  |
जैह्म्य-ह्रीभ्यां, यथा —
का वृषस्यति तं गोष्ठ-भुजङ्गं कुल-पालिका ।
दूति यत्र स्मृते मूर्तिर् भीत्या रोमाञ्चिता मम ॥२.४.१२४॥ |
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| अनुवाद |
| छल और लज्जा से छिपना: "हे दूत! क्या कोई सुहागन स्त्री ग्वालों के बीच ऐसे सर्प की इच्छा करेगी? उसका स्मरण करते ही भय से मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए हैं।" |
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| Hiding with deceit and shame: "O messenger! Would any married woman desire such a snake among cowherds? The very thought of him makes my body hair stand on end with fear." |
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