श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 124
 
 
श्लोक  2.4.124 
जैह्म्य-ह्रीभ्यां, यथा —
का वृषस्यति तं गोष्ठ-भुजङ्गं कुल-पालिका ।
दूति यत्र स्मृते मूर्तिर् भीत्या रोमाञ्चिता मम ॥२.४.१२४॥
 
 
अनुवाद
छल और लज्जा से छिपना: "हे दूत! क्या कोई सुहागन स्त्री ग्वालों के बीच ऐसे सर्प की इच्छा करेगी? उसका स्मरण करते ही भय से मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए हैं।"
 
Hiding with deceit and shame: "O messenger! Would any married woman desire such a snake among cowherds? The very thought of him makes my body hair stand on end with fear."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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