श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.4.107 
अथ (१७) जाड्यम् —
जाड्यम् अप्रतिपत्तिः स्याद् इष्टानिष्ठ-श्रुतीक्षणैः ।
विरहाद्यैश् च तन्-मोहात् पूर्वावस्थापरापि च ।
अत्रानिमिषता तूष्णीम्-भाव-विस्मरणादयः ॥२.४.१०७॥
 
 
अनुवाद
"किसी भी चीज़ का निर्णय करने की क्षमता का अभाव, जो वांछनीय या अवांछनीय चीज़ों को सुनने या देखने से या वियोग से उत्पन्न होता है, जाद्यम् कहलाता है। यह मोह (निष्क्रिय मन) से पहले या बाद में होता है। इस अवस्था में आँखों का झपकना, मौन और विस्मृति होती है।"
 
"The lack of ability to judge anything, which arises from hearing or seeing desirable or undesirable things, or from separation, is called Jadyam. It occurs before or after Moha (the inactive mind). In this state there is blinking of the eyes, silence, and forgetfulness."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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