श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 4: व्याभिचारी-भाव (क्षणिक आनंदवर्धक अस्थिरताएँ)  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  2.4.104 
अत्राङ्ग-भजो जृम्भा च क्रिया द्वेषो’क्षि-मर्दनम् ।
शय्यासनैक-प्रियता तन्द्रा-निद्रादयो’पि च ॥२.४.१०४॥
 
 
अनुवाद
“इस अवस्था में अंगों में खिंचाव, जम्हाई आना, काम से घृणा, आंखें मलना, लेटना, बैठने की इच्छा, थकावट और नींद आना जैसी समस्याएं होती हैं।”
 
“This condition is characterized by stretching of the limbs, yawning, aversion to work, rubbing of the eyes, desire to lie down, sit, fatigue and sleepiness.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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