श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  2.3.92 
अथ प्रतीपाः —
हिताद् अन्यस्य कृष्णस्य प्रतीपाः क्रुद्-भयादिभिः ॥२.३.९२॥
 
 
अनुवाद
“कृष्ण के शत्रुओं के भीतर सामान्यतः क्रोध या भय से उत्पन्न सात्त्विकाभास को प्रतिप-सात्त्विकाभास कहा जाता है।”
 
“The sattvicābhāsa arising from anger or fear within the enemies of Kṛṣṇa is generally called pratyapa-sattvicābhāsa.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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