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श्लोक 2.3.90  |
यथा —
निशमयतो हरि-चरितं न हि सुख-दुःखादयो’स्य हृदि भावाः ।
अनभिनिवेशाज् जाता कथम् अस्रवद् अस्रम् अश्रान्तम् ॥२.३.९०॥ |
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| अनुवाद |
| "जब कोई व्यक्ति भगवान की लीलाओं का श्रवण करते हुए भी हृदय की कठोरता के कारण न तो प्रसन्नता का अनुभव करता है और न ही दुःख का, तो उसकी आँखों से निरन्तर आँसू कैसे बहते रहते हैं? यह तो अभ्यास से ही होगा।" |
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| "When a person, despite hearing the pastimes of the Lord, experiences neither joy nor sorrow due to hardness of heart, how come tears flow from his eyes continuously? This can only happen through practice." |
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