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श्लोक 2.3.81  |
उद्दीप्ता एव सूद्दिप्ता महा-भावे भवन्त्य् अमी ।
सर्व एव परां कोटिं सात्त्विका यत्र बिभ्रति ॥२.३.८१॥ |
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| अनुवाद |
| "जब सभी उद्दीप्त-सात्त्विक भाव महाभाव में प्रकट होते हैं, तो उन्हें सुदीप्त-सात्त्विक भाव कहते हैं। सभी सात्त्विक भाव महाभाव में अपनी सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करते हैं।" |
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| "When all the Udipta-Sattvik Bhavas manifest in Mahabhava, they are called Sudipta-Sattvik Bhavas. All the Sattvik Bhavas attain their highest state in Mahabhava." |
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