श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  2.3.81 
उद्दीप्ता एव सूद्दिप्ता महा-भावे भवन्त्य् अमी ।
सर्व एव परां कोटिं सात्त्विका यत्र बिभ्रति ॥२.३.८१॥
 
 
अनुवाद
"जब सभी उद्दीप्त-सात्त्विक भाव महाभाव में प्रकट होते हैं, तो उन्हें सुदीप्त-सात्त्विक भाव कहते हैं। सभी सात्त्विक भाव महाभाव में अपनी सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त करते हैं।"
 
"When all the Udipta-Sattvik Bhavas manifest in Mahabhava, they are called Sudipta-Sattvik Bhavas. All the Sattvik Bhavas attain their highest state in Mahabhava."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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