श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  2.3.8 
यथा —
स्व-विलोचन-चातकाम्बुदे
पुरि नीते पुरुषोत्तमे पुरा ।
अतिताम्र-मुखी सगद्गदं
नृपम् आक्रोशति गोकुलेश्वरी ।
इमौ गौणौ वैवर्ण्य-स्वर-भेदौ ॥२.३.८॥
 
 
अनुवाद
द्वितीयक स्निग्ध-सात्त्विक-भाव का एक उदाहरण: "जब कृष्ण, जो उनके नेत्रों के चातक पक्षी के लिए वर्षा के बादल थे, मथुरा लाए गए, तो यशोदा क्रोध से लाल हो गईं और रुंधे हुए स्वर में नंद महाराज को डाँटने लगीं।" इस उदाहरण में, यशोदा के रंग में परिवर्तन और रुंधे हुए स्वर का कारण क्रोध की द्वितीयक रति है।
 
An example of secondary snigdha-sattvika-bhāva: "When Kṛṣṇa, who was like a rain cloud to the chataka bird in her eyes, was brought to Mathura, Yaśodā turned red with anger and began to rebuke Nanda Mahārāja in a choked voice." In this example, the cause of Yaśodā's change in complexion and choked voice is the secondary passion of anger.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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