श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  2.3.72 
यथा —
आकर्णयन्न् अघहराम् अघ-वैरि-कीर्तिं
पक्ष्माग्र-मिश्र-विरलाश्रुर् अभूत् पुरोधाः ।
यष्टा दरोच्छ्वसित-लोम-कपोलम् ईषत्-
प्रस्विन्न-नासिकम् उवाह मुखारविन्दम् ॥२.३.७२॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "जब यज्ञकर्ता ने कृष्ण द्वारा अघासुर के वध की कीर्ति सुनी, तो उसके नेत्रों के अग्रभागों में कुछ आँसू भर आए, उसके गालों पर रोंगटे खड़े हो गए और उसकी नाक पर पसीने की कुछ बूँदें उभर आईं। इस प्रकार उसका मुखकमल चमक उठा।"
 
Example: "When the sacrificer heard the fame of Krishna's killing of Aghasura, a few tears welled up in the tips of his eyes, goosebumps appeared on his cheeks, and a few drops of sweat appeared on his nose. Thus his lotus face shone."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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