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श्लोक 2.3.55  |
रोषेण, यथा हरि-वंशे (२.६६.२४) —
तस्याः सुस्राव नेत्राभ्यां वारि प्रणय-कोपजम् ।
कुशेशय-पलाशाभ्याम् अवश्याय-जलं यथा ॥२.३.५५॥ |
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| अनुवाद |
| क्रोध से, हरि-वंश [2.66.24] से: “सत्यभामा की कमल-पंखुड़ियों वाली आँखों से क्रोध से उत्पन्न ओस की बूंदों की तरह आँसू गिर रहे थे।” |
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| From anger, from Hari-vamsa [2.66.24]: “Tears fell from Satyabhama's lotus-petal eyes like dewdrops born of anger.” |
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