श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  2.3.55 
रोषेण, यथा हरि-वंशे (२.६६.२४) —
तस्याः सुस्राव नेत्राभ्यां वारि प्रणय-कोपजम् ।
कुशेशय-पलाशाभ्याम् अवश्याय-जलं यथा ॥२.३.५५॥
 
 
अनुवाद
क्रोध से, हरि-वंश [2.66.24] से: “सत्यभामा की कमल-पंखुड़ियों वाली आँखों से क्रोध से उत्पन्न ओस की बूंदों की तरह आँसू गिर रहे थे।”
 
From anger, from Hari-vamsa [2.66.24]: “Tears fell from Satyabhama's lotus-petal eyes like dewdrops born of anger.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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