श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  2.3.5 
यथा —
कुन्दैर् मुकुन्दाय मुदा सृजन्ती
स्रजां वरां कुन्द-विडम्बि-दन्ती ।
बभूव गान्धर्व-रसेन वेणोर्
गान्धर्विका स्पन्दन-शून्य-गात्री ॥२.३.५॥
 
 
अनुवाद
प्रमुख स्निग्ध-सात्विक-भाव का एक उदाहरण: "राधा, जिनके दाँत कुंद के पुष्प से भी अधिक श्वेत थे, मुकुंद के लिए कुंद के पुष्पों की एक उत्तम माला बनाते समय, बाँसुरी की मधुर ध्वनि सुनकर स्तब्ध रह गईं।"
 
An example of the dominant Snigdha-Satvika-Bhava: "Radha, whose teeth were whiter than the Kunda flower, while making a beautiful garland of Kunda flowers for Mukunda, was stunned to hear the sweet sound of the flute."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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