श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  2.3.45 
अमर्षेण, यथा —
कृष्णाधिक्षेप-जातेन व्याकुलो नकुलाम्बुजः ।
चकम्पे द्राग् अमर्षेण भू-कम्पे गिरिराड् इव ॥२.३.४५॥
 
 
अनुवाद
क्रोध से: “शिशुपाल द्वारा कृष्ण की निन्दा सुनकर सहदेव क्रोध से अस्थिर हो गए और भूकंप के समय विशाल पर्वत की भाँति काँपने लगे।”
 
Anger: “Upon hearing Shishupal's slander against Krishna, Sahadeva became restless with anger and began to tremble like a huge mountain during an earthquake.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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