श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.3.44 
तत्र वित्रासेन, यथा —
शङ्ख-चूडम् अधिरूढ-विक्रमं
प्रेक्ष्य विस्तृत-भुजं जिघृक्षया ।
हा व्रजेन्द्र-तनयेति-वादिनी
कम्प-सम्पदम् अधत्त राधिका ॥२.३.४४॥
 
 
अनुवाद
भय से: "जब शंखचूड़ ने अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए राधा को पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, तो वह चिल्ला उठीं, 'हे व्रजराज के पुत्र!' उनका पूरा शरीर भय से कांपने लगा।"
 
Out of fear: “When Sankhachud, displaying his prowess, stretched out his hand to seize Radha, she cried out, ‘O son of Vrajaraja!’ Her whole body trembled with fear.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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