श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  2.3.42 
भीतेर्, यथा —
त्वय्य् अर्पितं वितर वेणुम् इति प्रमादी
श्रुत्वा मद्-ईरितम् उदीर्ण-विवर्ण-भावः ।
तूर्णं बभूव गुरु-गद्गद-रुद्ध-कण्ठः
पत्री मुकुन्द तद् अनेन स हारितो’स्ति ॥२.३.४२॥
 
 
अनुवाद
भय से: "मैंने आपकी दासी पत्री से कहा, 'आपके पास रखी हुई वह बांसुरी मुझे दे दीजिए।' मेरी बात सुनकर उस लापरवाह पत्री का रंग बदल गया और उसका गला रुँध गया, 'हे मुकुन्द! उसकी असावधानी के कारण आपकी बांसुरी खो गई है।"
 
Fearfully: "I said to your maidservant Patri, 'Please give me the flute you have with you.' Hearing my words, that careless Patri's complexion changed and her throat choked, 'O Mukunda! Because of her carelessness your flute has been lost.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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