श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  2.3.17 
चत्वारि क्ष्मादि-भूतानि प्राणो जात्व् अवलम्बते ।
कदाचित् स्व-प्रधानः सन् देहे चरति सर्वतः ॥२.३.१७॥
 
 
अनुवाद
"प्राण पृथ्वी, जल, अग्नि और आकाश इन चार तत्वों का आश्रय लेता है, और कभी-कभी स्वयं का भी आश्रय लेता है। फिर प्राण पूरे शरीर में गति करता है।"
 
"Prana takes shelter in the four elements: earth, water, fire, and space, and sometimes even in itself. Then Prana moves throughout the body."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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