श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 3: सात्त्विक-भाव (अस्वेच्छित आनंदवर्धक अभिव्यंजनाएँ)  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  2.3.1 
कृष्न-सम्बन्धिभिः साक्षात् किञ्चिद् वा व्यवधानतः ।
भावैश् चित्तम् इहाक्रान्तं सत्त्वम् इत्य् उच्यते बुधैः ॥२.३.१॥
 
 
अनुवाद
"रस के विषय में, जब हृदय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण के संबंध में रति या भाव से अभिभूत हो जाता है, तो विद्वान इसे सत्व कहते हैं।"
 
"Regarding rasa, when the heart is directly or indirectly overwhelmed with love or feeling in relation to Krishna, the learned call it sattva."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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