श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 99
 
 
श्लोक  2.1.99 
यथा —
शरज्-ज्योत्स्ना-तुल्यः कथम् अपि परो नास्ति समयस्
त्रिलोक्याम् आकृईडः क्वचिद् अपि न वृन्दावन-समः ।
न काप्य् अम्भोजाक्षी व्रज-युवति-कल्पेति विमृशन्
मनो मे सोत्कण्ठं मुहुर् अजनि रासोत्सव-रसे ॥२.१.९९॥
 
 
अनुवाद
उदाहरण: "चन्द्रमा की चांदनी में शरद ऋतु के समान कोई समय नहीं है। तीनों लोकों में वृन्दावन के समान कोई मनोरंजन स्थल नहीं है। ब्रज की युवतियों के समान कमल-नयन वाली कोई स्त्रियाँ नहीं हैं। यह सोचकर, मेरा हृदय रास नृत्य के आस्वादन के लिए लालायित है।"
 
Example: "There is no time like autumn in the moonlight. There is no place of entertainment like Vrindavan in the three worlds. There are no women with lotus-like eyes like the maidens of Braj. Thinking of this, my heart yearns to savor the Raas dance."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd