श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.1.87 
यथा —
पारावती-विरचनेन गवां कलापं
गोपाङ्गना-गणम् अपाङ्ग-तरङ्गितेन ।
मित्राणि चित्रतर-सङ्गर-विक्रमेण
धिन्वन्न् अरिष्ट-भयदेन हरिर् विरेजे ॥२.१.८७॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण गोपगीत रचकर सभी गायों को आनंद प्रदान करते हैं। वे अपनी भौंहों की गति से गोपियों को प्रसन्न करते हैं। वे वीरतापूर्ण कार्यों से अपने मित्र को आनंदित करते हैं। ये सभी क्रियाएँ एक साथ अरिष्टासुर को भयभीत करती हैं (यह देखकर कि कृष्ण कितने निर्भय रहते हैं)।"
 
"Krishna brings joy to all the cows by composing cow songs. He pleases the cowherds with the movement of His eyebrows. He delights His friend with heroic deeds. All these actions together frighten Arishtasura (seeing how fearless Krishna is)."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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