श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  2.1.62 
यथा वा —
वामस् तामरसाक्षस्य भुज-दण्डः स पातु वः ।
क्रीडा-कन्दुकतां येन नीतो गोवर्धनो गिरिः ॥२.१.६२॥
 
 
अनुवाद
एक अन्य उदाहरण: “कमल-नेत्र कृष्ण का बायां हाथ, जिसने गोवर्धन पर्वत को गेंद की तरह उठा रखा है, आपकी रक्षा करे!”
 
Another example: “May the left hand of lotus-eyed Krishna, who holds the Govardhana mountain like a ball, protect you!”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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