श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 61
 
 
श्लोक  2.1.61 
यथा —
पश्य विन्ध्य-गिरितो’पि गरिष्ठं दैत्य-पुङ्गवम् उदग्रम् अरिष्टम् ।
तुल-खण्डम् इव पिण्डितम् आरात् पुण्डरीक-नयनो विनुनोद ॥२.१.६१॥
 
 
अनुवाद
“देखो! कमल-नेत्र कृष्ण ने विंध्य पर्वत से भी भारी और ऊँचे, महानतम राक्षस अरिष्टासुर को बहुत दूर फेंक दिया है।”
 
"Look! Lotus-eyed Krishna has thrown far away the greatest demon Arishtasura, heavier and taller than the Vindhya mountains."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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