श्री भक्ति रसामृत सिंधु  »  सागर 2: दक्षिणी विभाग: सामान्य भक्ति रस  »  लहर 1: विभाव (आनंदवर्धक अवस्थाएँ)  »  श्लोक 381
 
 
श्लोक  2.1.381 
अथ तुलसी, यथा बिल्वमङ्गले —
अयि पङ्कज-नेत्र-मौलि-माले
तुलसी-मञ्जरि किञ्चिद् अर्थयामि ।
अवबोधय पार्थ-सारथेस् त्वं
चरणाब्ज-शरणाभिलाषिणं माम् ॥२.१.३८१॥
 
 
अनुवाद
कृष्ण-कर्णामृत से तुलसी का एक उदाहरण: "हे तुलसी, कमल-नयन कृष्ण के मुकुट की कली! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ। अर्जुन के सारथी को सूचित करें कि मैं उनके चरण-कमलों की शरण चाहता हूँ।"
 
An example of Tulsi from Krishna-Karnāmṛta: "O Tulsi, bud of the crown of lotus-eyed Krishna! I offer you a prayer. Inform Arjuna's charioteer that I seek refuge at his lotus feet."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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